चाणक्य नीति
Sahitya
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प्रस्तुत पुस्तक ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ का हिन्दी में संक्षिप्त रूपान्तर है। इसका प्रयोजन साधारण हिन्दी जगत् को प्राचीन भारतीय साहित्य की इस अनुपम कृति से परिचित कराना है।
सर्वप्रथम सन् 1905 में दक्षिण भारत के तञ्जौर ज़िला निवासी एक ब्राह्मण ने मैसूर गवर्नमेंट प्राच्य पुस्तकालय में ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ की एक हस्तलिखित प्रति भेंट की। पुस्तकालय के तत्कालीन अध्यक्ष शाम शास्त्री ने उस प्रति का सूक्ष्म अध्ययन करके इसका प्रथम संस्करण 1909 में प्रकाशित किया और पुस्तक के साथ प्राप्त भट्टस्वामी की आंशिक टीका के आधार पर 1915 में इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया।

पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही भारत तथा पाश्चात्य देशों में हलचल-सी मच गई क्योंकि इसमें शासन-विज्ञान के उन अद्भुत तत्त्वों का वर्णन पाया गया, जिनके सम्बन्ध में भारतीयों को सर्वथा अनभिज्ञ समझा जाता था। पाश्चात्य विद्वान फ्लीट, जौली आदि ने इस पुस्तक को एक ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण’ ग्रंथ बतलाया और इसे भारत के प्राचीन इतिहास के निर्माण में परम सहायक साधन स्वीकार किया।
इस पुस्तक की रचना आचार्य विष्णुगुप्त ने की, जिसे कौटिल्य और चाणक्य नामों से भी स्मरण किया जाता है। पुस्तक की समाप्ति पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है।

We are pleased to present a collection of 15 chapters written by Chanakya in 4th Century BC. These neeti(s) were in written in thousands years before you will amazed to know that they
are still applicable to 2015. Please do take a look. These are all written in Hindi so you don't need to learn Sanskrit.

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Chanakya was an Indian teacher, philosopher and royal advisor. Originally a professor of economics and political science at the ancient Takshashila University, Chanakya managed the first Maurya emperor Chandragupta's rise to power at a young age.

Chanakya is traditionally identified as Kautilya or Vishnu Gupta, who authored the ancient Indian political treatise called Arthasastra. As such, he is considered as the pioneer of the field of economics and political science in India, and his work is thought of as an important precursor to Classical Economics. Chanakya is often called the "Indian Machiavelli", although his works predate Machiavelli's by about 1,800 years. His works were lost near the end of the Gupta dynasty and not rediscovered until 1915.

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